kaha ho sanwariyan dar dar bhatka hu main

दर दर भटका हूँ मैं कितना तनहा हूँ मैं
कहाँ हो सांवरिया ………
अनजानी राहो में दुःख दर्द की बाहों में
कहाँ हो सांवरिया ……….
दर दर भटका हूँ मैं …………

जब से रूठे हो तुम तक़दीर ही रूठ गयी
ऐसा लगता मुझको हस्ती ही टूट गयी
सब कुछ खोया हूँ मैं कितना रोया हूँ मैं
कहाँ हो सांवरिया ……….

मुझ जैसे पापी को तुमने अपनाया था
तेरी किरपा बाबा मैं समझ न पाया था
बेहाल हुआ हूँ मैं तेरे द्वार खड़ा हूँ मैं
कहाँ हो सांवरिया ……….

सूरज ना कोई मेरा एक आसरा बस तेरा
अब आओ न बाबा क्यों मुख को है फेरा
दुःख का मारा हूँ मैं खुद से हारा हूँ मैं
कहाँ हो सांवरिया ……….

कृष्ण भजन